ऐसा कहते हैं
कि ये सृष्टि, बहुत सुंदर,
बहुत अनुपम और बहुत अद्भुत है;
और बहता है यहाँ हर ओर,
बेहद सुंदर संगीत।
किंतु प्रभु!
इस अनुपम, अदभुत और
सुंदर सृष्टि को, तुमने
किस उपक्रम से रचा है,
जबकि इसे देखने वाले
असंख्य नेत्रों में इसे
उस रूप में देखने की
दृष्टि ही नहीं और
ना है उस कर्ण-प्रियता को
अनुभव कर पाने योग्य हृदय!
हे प्रभु!
इस अनुपम, अद्भुत और सुंदर
सृष्टि को तुमने
किस उपक्रम से रचा है
जबकि इसे अनुभव करने की
शुभेच्छा से तड़पते हृदयों को
मिलती है- बस और तड़प...!
और बार-बार ही वे हृदय,
कराह उठते हैं,
और चीख कर पूछते हैं,
"कहाँ है वो सृष्टि, प्रभु!
जो बहुत सुंदर,
बहुत अनुपम और बहुत अद्भुत है...
और बहता है हर ओर जहाँ,
बेहद सुंदर संगीत...?!"
किंतु दिखाई देता है उन्हें,
हर ओर फैला निरंतर अंधकार
और सुनाई देता है,
कानों को भेदता
तुम्हारा अनंत मौन...!!
२४०३१९





