हे परमात्मा, तुम लिखवाते,
कलम पकड़ स्याही बिखराते;
भावों और लफ़्ज़ों में बसकर,
नये-नये तुम गीत रचाते।
लफ़्ज़, लफ़्ज़ प्रेमी जोड़ों-से,
मिलते, मिलकर गीत बनाते,
और विरह में इक-दूजे के,
आँसू से नगमे लिख जाते।
ऐसे कितने गीत सुरीले,
अल्फ़ाज़ों के प्रेम से निकले,
ऐसे कितने गीत दर्द के,
जुदा हुए लफ़्ज़ों से निकले।
शब्दों के इस विरह-मिलन से,
छंदों के रस झरते जाते,
भावों और लफ़्ज़ों में बसकर,
नये-नये तुम गीत रचाते।
लफ़्ज़ वही, पर अर्थ बदलते,
तुम अनुभव बन रूप बदलते,
मतला, मक्ता और काफ़िया,
गीतों के सुर-ताल बदलते।
ऐसी कितनी नज़्म लिखी थीं,
जब तुमसे अनजाने थे हम,
थोड़ा परिचय हुआ अभी जो,
जाना, तुमसे बँधी ये कलम।
किंतु अभी भी बेहोशी में,
लिखे गीत अपना बतलाते,
भावों और लफ़्ज़ों में बसकर,
नये-नये तुम गीत रचाते।
२५०८१२/२५०८१८





