मैं धुंधला-धुंधला देख रहा,
उस भीनी-भीनी खुशबू को;
हौली-हौली-सी आवाज़ें,
सहला जाती हर रोएँ को!
वो छिप जाती, वो फिर आती,
क्या खेले छिपन-छिपैया वो?
रोते-मुस्काते ढूँढ-ढूँढ,
मचले उसके आलिंगन को।
ये पास रही, अरे कहाँ गई!
पीछे आ धप्पा बोल गई।
हम चौंके-चौंके खड़े रहे,
वो कूँद-फाँद दीवारों से।
ये आँखमिचौली कब तक की?
मायूस बड़ा ये कर डाले।
हाय! टपक-टपक हिय करता है,
गूँगा कर देगी क्या इसको?!
२००१०८/२००१०८





