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एक अजन्मे को पत्र
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अनुभव-शून्य - अनहद की कलम से

अनुभव-शून्य

अभी तो ज़िंदगी का सवेरा बीता ही है!
अब तलक तो जिए हैं
बस उस सुबह की नर्म तरावट में…!
अभी दिन की तपिश
और रात के अंधकार से वास्ता ही कहाँ रहा है…!

लिख नहीं सकता हूँ जीवन 
के कोई अनुभव यहाँ;
जो जानता हूँ किस तरह
सिमटा हुआ उनका जहाँ। 

पारकर दहलीज़ यौवन
में मैं पहुंचा हूँ अभी;
राह जब कुछ और भी
बढ़ जाए, सीखूँगा तभी।

सिर्फ सुनता, या हूँ कहता,
या मैं लिखता हूँ कहीं;
'संघर्ष' क्या है, अब तलक,
मैं जान पाया हूँ नहीं।

शुभ्र केशों को बहुत
देखा है मैने पास से;
हैं नहीं मेंरे अभी,
दिखते हैं बिल्कुल स्याह से।

गीत गा-गाकर मेरे
जीवन के निकले हैं बसंत;
प्रेम को संगीत का
माना था आदि और अंत।

ना कहें उद्‌दण्डता,
उच्छृंखलता शेष है;
बचपना बीता है किन्तु
परिपक्वता बस लेश है।

अक्षरों का स्वाद चखकर,
शब्द को छू पाऊँगा;
'स्व' को मैं जाने बिना
'स्वयं' को ना पाऊँगा।

हूँ बड़ा, होता बड़ा,
होता बड़ा हो जाऊँगा;
तब ही अपने अनुभवों को
पृष्ठ पर लिख पाऊँगा।

९०१११२/९०१११२