दो घंटे की बातचीत में,
कितने रंग उभर आए,
नीले-पीले, लाल-गुलाबी,
श्वेत- श्याम भी घुल आए।
रस में डूबी कही, सुनी में,
मन-कलिकाएँ खिल आईं,
कभी उदासी, कभी खुशी में,
आँख की पलकें भर आईं!
शुरू किया था इसी कथन से:
हिन्दी अनुवाद
"कुछ खोए ना... प्यार किया
जो, वस्तु, मित्र आते-जाते,
पकड़ो उनको- पकड़ ना पाओ,
जैसे चंदा की रातें।
किंतु छुआ है जीवन तेरा,
और लहर भीतर उछली,
प्यार तेरा वो अपना प्यारे,
सागर तट लहरें बिखरीं।
भीतर-भीतर गहराई में,
जो भी रतन संभाले हैं,
तेरे होने में घुल-घुल कर,
तेरा प्यार संवारे हैं।
तू दुख ना ले, जो खोया कुछ,
जिसको प्रेम किया तूने,
प्रेम किया तो प्रेम खिला,
ना रहे बाग, बगिया सूने।
शुरू किया था इसी कथन से
और दो-पहर बीत गए।
२३१२१०/२३१२१०





