कहाँ हूँ मैं!
“कुछ लिखो तुम।””क्या लिखूँ ?लिखने के जैसे भाव भीतर खो गए।जग रहा मैं, पर जगत की चाल-गति में,भाव भीतर सो गए!शून्य में खुद को तलाशूँ-शून्य में ढूढ़ूँ तुझे पर, शून्य …
“कुछ लिखो तुम।””क्या लिखूँ ?लिखने के जैसे भाव भीतर खो गए।जग रहा मैं, पर जगत की चाल-गति में,भाव भीतर सो गए!शून्य में खुद को तलाशूँ-शून्य में ढूढ़ूँ तुझे पर, शून्य …
सुधिजन उन सभी को बड़ा लोभी कहते हैं, जो सुस्वादु भोजन पाने को आतुर हों-और पाकर आनंदित होते हैं।अपनी जिंह्वा को तृप्त कर स्वयं भी तृप्त अनुभव करते हैं।कुछ मधु …
मैँ चलता-दौड़ता,लड़खड़ाता-गिरता,फिर उठता, चलता-दौड़ता-लड़खड़ाता-गिरता-उठता,उस रास्ते के अंतिम छोर तक पहुंचता हूँ,और पाता हूँ, कि वो रास्ता-कहीं आगे, और कहीं नहीं जाता। मैं असमंजस से भरता-ढूँढता,रोता-बिलखता,शांत होता-फिर ढूँढता-और कुछ ना पाता-सोचता …
बाहर बारिश, भीतर सूखा,तृप्त भूख, पर प्यासा भूखा!पतझड़ की शाखा-सा उजड़ा,पत्तों को देखूँ बेबस-सा,गिरते और समाते उर में- धरती, लाज बचा लो!—————————————–कहाँ हो- मैं ढूँढ़ता हूँ तुम्हें,कि तुम बताते थे …