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एक अजन्मे को पत्र
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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

चाँद, तुम और दूरी

एक- चाँद पूनम के चंदा को देखा।भीतर दौड़ा, पहनी चप्पल, दौड़ के आकर बाहर देखा,चाँद अमावस चला गया! दो- तुम तुमने दिखलाया मुझे चाँद अपनी अंगुली से, फिर पकड़ कर …

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इस पथ पर मैं कैसे आया…

मैं स्वयं आ गया इस पथ पर या तुम ही मुझको ले आए?क्या भूले-भटके मैं आया, लक्ष्य साध या मार्ग चला?निकल पड़ा यूँ ही आवारा, या जीवन से भाग चला?!क्या …

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कौन है आतुर!

हर लम्हा बस गुजरता है.. और यह देह हो जाती है उतनी ही पुरानी- लम्हा-लम्हा!इसके भीतर ही छिपा हूँ मैं….! मगर क्या निकल पाऊँगा इस देह से, इसके खत्म हो …

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स्वीकार कर आगे बढ़ो

वो रिश्ते- जिनने जी लिया जो वक़्त अपना;उन्हें पहचानों, औ’ उनकी उम्र को स्वीकार कर आगे बढ़ो।ये जीवन है बड़ा लंबा, कई किरदार सब खेलें; कि समझो ये नया रस्ता, …

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