SUHAS MISHRA
मृत्यु
साँस जाती है और साँस आती है।यूँ तो ये फासला होता है एक पल का। मगर कभी ये हो जाता है एक अंतहीन फ़ासला ! १९११२१/१९११२१
निर्ध्वनि की ध्वनि
ये सत्य नहीं साकार हो रहा, प्रभु तब तक मैं डोल रहा; ये समझूँ पर वो भी मानूू, ना पकड़ूँ, ना छोड़ रहा।चलता हूँ इक राह पकड़, फिर किस पगडंडी …





