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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

तुम आ जाओ, प्रभु

ठहरी, पर अशांत,क्रांत-क्रांत… !समय का पल-पल आँख से गुज़रता…मन को धकियाता-साकुरे‌दता और उग्र करता…पर बेबस मैं…कौन मैं?!मन नहीं।आत्मा नहीं।देह नहीं।फिर कौन?!कौन आभास पाता है, मन की उग्रता का?कौन ग्राह्य करता …

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डायरी के पन्नों से

एक रात बिस्तर में डूब जाती है, आँख दिन भर में ऊब जाती है,खाब देखें तो किसके देखें, दुनिया बेनूर ही नज़र आती है।इस जमाने को तू चलाता है खुदा,मेरे …

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केदारनाथ-१- वायु और जल

जीवन के दो मूलाधार, वायु और जल से संसार।वायु मनुज साँसों में लेता, इन साँसों से जीवन बनता,दो साँसों के मध्य श्रेयस में, धन्यवाद वृक्षों का गुनता।वृक्षों का परिवार वनों …

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हम मिल ही गए!

उस पूनम को मैंने तुम्हे चाँद में देखा।मैंने देखा कि तुम एक रातरानी सेफुसफुसाते कुछ कहती हो…।मैं अपने आँगन में पूछता हूँ,इक गुलाब की पंखुड़ी से,”जागती हो, अभी सोई नहीं?”वो …

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