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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

जीना, होना और हारा केंद्र

कुछ घुमड़ता-सा, उमड़ता-सा…व्यक्त होने को बेचैन-सा।दिल के आस-पास या दिल में हीकुछ खुलने की चाह में व्याकुल–व्यग्र-सा। हारा-केंद्र पर ध्यानऔर उस तक पहुंचने की आकुलता?नहीं… अभी आकुलता तो नहींमगर तड़प …

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तस्वीर से परे

ये ना जाने क्यूँ मुझे,लग रहा यूँ देख के,आपका ये चित्र मेरे सामने।लाड़ से यूँ देखते,प्यार से यूँ देखते,मुस्कुरा के भर रहे हो भाव से। जैसे कह रहे हो यूँ,मैं …

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केदारनाथ-२- वन और हमारी साँसें

यहाँ-माँ ने बेटे को प्यार सेलोरी गा, सुलाया,और फिर प्रेम से उसकोनिहारती रही…देर तक- “नन्हा-नन्हा-सा चेहरा,नन्हे-नन्हे-से हाथ और पाँव,और नन्हा, प्यारा-सा, छोटा-साउठता और सिमटता सीना।”‘श्वास!’- माँ सोच उठती,’यही सीने का …

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कुछ कतरने बिखरीं-सी

..१..शीश पर शिव के सुशोभित,शशि ही बस शुभ्र है–मैं निरा बलहीन,शिवनख की भी स्तुति क्या करूँ!! २४०२०९ ..२..पंख हैं?महसूस तो होते नहीं…!उन उड़ानों को कि जिन काज़िक्र तुम करती रहीं …

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