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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

गांभीर्य और गहराई

लम्हा लम्हा वक़्त बदलता है,जीवन अर्थों में साकार-ठोस, कभी पिघलता-सा और कभी धुआँ-धुआँ!छू लेने भर से क्या समझा जा सकता है इसके गांभीर्य का वज़न?! सीढ़ियाँ क्या सिर्फ ऊपर जाने …

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हर ख़ाब की पहली शर्त हो

बारिश की पहली फुहार से भीगीमाटी की, सौंधी खुशबू हो तुम।समुंदर की रेत से मिले सीप कोअनायास पा गए बच्चे की आँख की,मासूम चमक हो तुम।अमिया के बौर से बौराईकोयल …

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रेत पर लकीरें

तुम जानते हो गम की लकीरों को रेत पर खींचना,पर भूल भी जाते हो इसे इतनी बेदर्दी से !तुमने पारंगत की है ये कला,सहेज कर कैसे रखें इन लकीरों को।”मानव …

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तुम नारी हो

एक करिश्मा हो तुम!तुम हो एक नदी,जो बहती है, जीवन के एक छोर से दूसरे छोर तक-बहने के लिए!बहती है, तमाम ऊबड़-खाबड़ रास्तों से बेखबर,और पा लेती है अपना समुंदर…-हवा …

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