…शांति ही बस चाहता हूँ
शांत, निस्पृह, मंद…. न कोई हलचल,न ध्वनि कहीं से।न आवेग कोई, न उग्रता का तनिक अंश ही। तूफान का कुछ नाम तक दिखता नहीं…। क्या जल ही सारा तलहटी में …
शांत, निस्पृह, मंद…. न कोई हलचल,न ध्वनि कहीं से।न आवेग कोई, न उग्रता का तनिक अंश ही। तूफान का कुछ नाम तक दिखता नहीं…। क्या जल ही सारा तलहटी में …
ये मील के पत्थर कुछ राहत तो देते हैं,मगर ले जाएंगे मुझे मेरी मंज़िल तलक…?-कौन कह पाएगा…!वो आवाज़ जो ख़ामोशी से निकलती है -भीतर से कहींऔर जानती है राज़ मेरी …
डरा-डरा सा आशंकित-सा चलता था मैं देख, साथ तुम चलती हो ना!आँखे थोड़ी तिरछी करके रहा बराबर देख, साथ तुम चलती हो ना!कई कदम हम साथ चले देखा मैंने तुम …