क्यूँ सच को तू रहा उतारे!
कल जो नज़र आता था सच, बिलाशक; आज दिखता है झूठ का बेदर्द चेहरा…! और कल…? कल तो तय करेगा वक़्त का हर आता लम्हा…! वहम, भरम के परदे ढाँप …
कल जो नज़र आता था सच, बिलाशक; आज दिखता है झूठ का बेदर्द चेहरा…! और कल…? कल तो तय करेगा वक़्त का हर आता लम्हा…! वहम, भरम के परदे ढाँप …
जीना तो होता है ‘आज’और अभी के इस नित्य बहते पल में …! मगर इस ‘आज’ को तो बोया था ‘बीते हुए किसी कल’ में …!और जो ‘आने वाला कल’ …
दोस्ती और प्यार कभी खत्म नहीं होता…!छिप सकता है कुछ देर को, वक्त की घनी, गहरी धुंध में…!और छटते ही उस धुंध के, फिर खिल उठता है अपनी उसी मासूम …
बादलों की गरजना की ढोल की-सी ताल पर,पवन संगत कर रही है तरुवरों से वाद्य पर;पाँव धरती पर पड़ें, उठते मधुर झंकार कर,आज अम्बर नाचता है, घुंघुरुओं को बाँध कर।सूर्य …