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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

क्यूँ सच को तू रहा उतारे!

कल जो नज़र आता था सच, बिलाशक; आज दिखता है झूठ का बेदर्द चेहरा…! और कल…? कल तो तय करेगा वक़्त का हर आता लम्हा…! वहम, भरम के परदे ढाँप …

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स्मृति से मिट गई थी…

दोस्ती और प्यार कभी खत्म नहीं होता…!छिप सकता है कुछ देर को, वक्त की घनी, गहरी धुंध में…!और छटते ही उस धुंध के, फिर खिल उठता है अपनी उसी मासूम …

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आज अम्बर नाचता है…

बादलों की गरजना की ढोल की-सी ताल पर,पवन संगत कर रही है तरुवरों से वाद्य पर;पाँव धरती पर पड़ें, उठते मधुर झंकार कर,आज अम्बर नाचता है, घुंघुरुओं को बाँध कर।सूर्य …

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