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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

आम्रवृक्ष

ये उत्सव, ये पर्व, ये त्यौहार…!ये प्रकृति हंसती है, झूमती है, नाचती है, अपने ही ढंग से…!ये प्रेम, ये ममता और ये अपनापन…!ये प्रकृति जताती है, निभाती है, फुसफुसाती हैअपने …

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दीपक

होम कर अपना अस्तित्व तुम दे जाते हो रात के गहन अंधकार में उजियारे की रोशनी …! मौन… निस्वार्थ…! दीपक तुम कितने प्रभावशाली हो,हो नन्हे पर कितने बलशाली हो;मैं अचरज …

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पद्य-विषय

लिख दूँ कोई शेर, कोई नगमा तुझ पर…! बाखुदा वो अल्फ़ाज़ ही नहीं, जो तेरे हुस्न की ताबीर कर सकें…! लिखने को मन की बातों को, बैठा उदित चंद्र बेला …

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