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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

… तुमको ये क्या हुआ!

मन की खुशी को मैं बाँध नहीं पाता हूँ,और किसी और से मैं बाँट नहीं पाता हूँ;दौड़ूँ  मैं, भागूँ मैं, मिलने की जल्दी में,बिछड़े, बरस बीते, जोड़ नहीं पाता हूँ।बातें …

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केदारनाथ-३- जल-प्रलय

वासनाओं के वशीभूत हो जब मनुष्य अंधी दौड़ में लग जाता है,तो लाभ और लोभ का अंतर तक भूल जाता है।माँ प्रकृति हर पल हमारे पोषण और कल्याण के लिएअपना …

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विवाह- मिलन दो आत्माओं का

है मिलन नहीं दूजा ऐसा, दो स्वयं मिले स्व मिला लिए;बन्धन आत्माओं का स्वतन्त्र, अनजान अभी, अब जान लिए।जो परम आत्म को तुम चाहो, बन्धन ये तुम्हें दिखा भी दे;जो …

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