SUHAS MISHRA
मैत्री-भाव संवाद
मेरे भावों की बस्ती में,आज बड़ा इक शोर हुआ;’आँसू’ जो दिखते ही ना थे,नृत्य बड़ा घनघोर हुआ;’विदा’ भाव जो छोड़ चुके थेबस्ती का कोना कोना;आज दिखें वो हर गलियारे,और उन्ही …
ज्ञात नहीं कब कौन घड़ी
नहीं द्वार पर थाप पड़ी,आई नहीं पदचाप कहीं;हौले से दिल में आ बैठा,ज्ञात नहीं कब कौन घड़ी।मित्रवृत्त से तुष्ट हुआ,नहीं कोई था कष्ट हुआ;नहीं अधिक मित्रों की चाहत,तब भी दिल …
एक अजन्मे को पत्र
“इस पत्र को तुम न समझना मात्र इसके शब्दों से ही… समझना इसके गूढ़ अर्थ को… !ये न समझ लेना कि जन्म लेना व्यर्थ है…!बल्कि जन्मने के पहले,ओ इस धरती …





