विरह-वेदना
हम टूटते हैं अकेले, और अकेले ही समेटते हैं टूट कर बिखरे हुए बेशुमार टुकड़े। बटोरते है उस धैर्य, उस आस्था और उस विश्वास के इधर-उधर छितराए महीन कण…! लम्हा-लम्हा …
हम टूटते हैं अकेले, और अकेले ही समेटते हैं टूट कर बिखरे हुए बेशुमार टुकड़े। बटोरते है उस धैर्य, उस आस्था और उस विश्वास के इधर-उधर छितराए महीन कण…! लम्हा-लम्हा …
ज़िंदगी के तमाम थपेड़ों से जूझते कब विदा हो जाता है प्रेम इस जीवन से, ख्याल ही नहीं रहता…। जब तलक समझ आता है, शून्यता गहन हो जाती है। फिर …