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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

विरह-वेदना

हम टूटते हैं अकेले, और अकेले ही समेटते हैं टूट कर बिखरे हुए बेशुमार टुकड़े। बटोरते है उस धैर्य, उस आस्था और उस विश्वास के इधर-उधर छितराए महीन कण…! लम्हा-लम्हा …

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… और तभी से ये ‘तट’ होगा 

ज़िंदगी के तमाम थपेड़ों से जूझते कब विदा हो जाता है प्रेम इस जीवन से, ख्याल ही नहीं रहता…। जब तलक समझ आता है, शून्यता गहन हो जाती है। फिर …

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निशा-सार

सुख और दुख, सही और गलत, रोशनी और अंधेरा… जीवन दो विपरीतताओं के संगम से ही पूर्ण होता है। वस्तुतः ये विपरीतताएँ – विपरीतताएँ नहीं बल्कि एक दूसरे की पूरक …

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