तभी ये अपना व्योम रचेगा
उस पोखर पर गिरते कंकड़ से उसके अस्तित्व का एक अंश–भर उठता है तमाम तरंगों की हुलक से…। पर मैं तो उस हुलक से बस कुछ देर तरंगित होता हूँ …
उस पोखर पर गिरते कंकड़ से उसके अस्तित्व का एक अंश–भर उठता है तमाम तरंगों की हुलक से…। पर मैं तो उस हुलक से बस कुछ देर तरंगित होता हूँ …
तिनका–तिनका जोड़ कर अपनी जिंदगी के हर लम्हे से, वो हमारे हिस्से का वक़्त बुनती है! कभी खामोशी से और कभी तेज़ आवाज़ से; कभी अपनी आंखों के महीन इशारे से …
एक असीम करुणा का नाम है गुरु…! जो स्वयं को मिला वो पूर्ण है, तत्क्षण मोक्षकारक…! किंतु मोक्षपूर्व ज्ञान प्रदान करने की एकमेव चाह…! असीम नमन और वंदन…! मैं भागता हूँ बार-बार,और तुम …