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एक अजन्मे को पत्र
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बस, खो जाऊँ तुझमें... - अनहद की कलम से

बस, खो जाऊँ तुझमें…

बस, खो जाऊँ तुझमें 
बस खोता ही जाऊँ!

और दिवस-निस क्या करना है,
और घड़ी-पल क्या डरना है।
बस सुमिरन ही प्रभु तेरा-
मैं रमता जाऊँ!
बस, खो जाऊँ तुझमें
बस खोता ही जाऊँ!

दूर गगन सूरज उग आए,
अंतरमन जग-मग कर जाए।
हर संध्या ये रविकिरणें
मैं बोता जाऊँ!
बस, खो जाऊँ तुझमें
बस खोता ही जाऊँ!

भक्ति भजन बस जप करना है,
तुमसे ही गपशप करना है।
तेरे हिरदय से लग कर
मैं रोता जाऊँ!
बस, खो जाऊँ तुझमें
बस खोता ही जाऊँ!

अँखियों में आँसू बहता है,
आँसू में तू ही झरता है।
झरनों में सर्बस अपना
मैं धोता जाऊँ!
बस खो जाऊँ तुझमें
बस खोता ही जाऊँ।

१८०९२५/१८०९२५