suhas_giten
WhatsApp Image 2025-07-08 at 21.29.45
previous arrowprevious arrow
next arrownext arrow
बेबस, मौन विछोह-2 - अनहद की कलम से

बेबस, मौन विछोह-2

डरा-डरा सा आशंकित-सा 
चलता था मैं देख,
साथ तुम चलती हो ना!
आँखे थोड़ी तिरछी करके
रहा बराबर देख,
साथ तुम चलती हो ना!

कई कदम हम साथ चले
देखा मैंने तुम चली साथ थीं।
कई मोड़ हम साथ मुड़े,
देखा मैंने तुम मुड़ीं साथ थीं।
पर फिर कहाँ, कहाँ जाती थी?
मोड़ नहीं मेरा ये तुम मुड़ती जाती थीं।

नहीं, नहीं...
तुम भूल गयी मुझको लगता था,
मोड़ नहीं तेरा-सा भी
मुझको दिखता था।
मैं ठिठक गया, तुम मुड़ती थीं;
मैं रुका रहा, तुम चलती थीं।

मैं देख रहा था तुमको-
ये तुम देख रही थीं।
तुम देख रही थीं मुझको-
मैंने देखा- तुम ये देख रही थीं।
'रुकती-चलती' चलती थीं-
तुम देख रही थीं।
तुम देख रहीं थी मुझे
बड़ी आशा दृष्टि से।

मैं देख रहा था तुम्हे
रोकना चाह रहा था
-रोक ना पा रहा था;
मैं देख रहा था तुम्हे
टोकना चाह रहा था
-टोक ना पा रहा था।

देखी थी तुमने भी मेरी बेबस नज़रेें,
टोक नहीं सकती थीं
केवल तक सकती थीं-
उसी मोड़ पर मुड़ते,
जो मेरा तो ना था,
उसी मोड़ पर मुड़ते,
जो तेरा भी ना था।

९२०११४/९२०११४