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एक अजन्मे को पत्र
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भाव घने हैं- मौन से शब्द तक - अनहद की कलम से

भाव घने हैं- मौन से शब्द तक

भाव घने हैं-
पर उनका शब्दों में खिलना,
खिल कर छंदों में गुँथ जाना,
और छंदों का स्याही से
कागज़ पर आना-
कुछ मुश्किल-सा क्यूँ लगता है?

भाव घने हैं-
पर शब्दों की नाव बनाकर,
जलधारा-से मनस पटल पर
उनको रखना,
होठों के तट पर गीतों का
बिछते जाना-
कुछ मुश्किल-सा क्यूँ लगता है?

भाव घने हैं-
और घनापन
पल-पल में बढ़ता जाता है।
राग, द्वेष और प्रेम, क्रोध सब
डोल रहे हैं।
मन के इन मिश्रित भावों के
अलग-अलग रंगों को चुनना-
कुछ मुश्किल-सा क्यूँ लगता है?

भाव घने हैं-
किंतु बरसना भूल गए हैं;
या कि धरा की प्यास तनिक
कमज़ोर पड़ी है,
और नहीं तो,
वेग पवन का बड़ा तीव्र है
-भाव वायु संग बह जाते हैं,
और बरसते हैं कोई अनजान नगर में।

भाव घने हैं-
और घनें भावों में बहते मुक्त छंद सब,
अन्य नगर को भिगो-भिगो
गीला करते हैं।
किसी देश की बहती नद में
या नौका बन,
कवि के मुक्तकंठ-से तट पर
सुर बनते हैं!

भाव घने हैं-
और घने भावों का थमना
क्या संभव है!

कुछ मुश्किल-सा हृदय तुम्हारे
जो लगता है,
समय-चक्र का वर्तुल बस
बदला जाता है-
अन्य हृदय में वही भाव
गर्भित, पोषित हो,
शब्द-पुष्प की दिव्य गंध से
भर जाता है-
कुछ मुश्किल-सा ना लगता है!

२१०६२०/२१०६२०