होश उसने जब संभाला-
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
खिलखिलाता, खेलता, रोता कभी
लड़ता-झगड़ता,
और कुछ पढ़ता-पढ़ाता,
रोज़ सोता, रोज़ उठता,
रोज़ खाता, रोज़ पीता
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
हाथ से अपने कभी नीचे खिसकती
हाफ निक्कर को उठाता,
और बहती नाक को,
पोंछ कर हाथों से अपने
होंठ तक आने से उसको वो बचाता।
रास्ते के सीप, मोती,
रेत के रंगीन पत्थर,
शर्ट की इक पोटली-सी बना,
उसमें छुपाता।
कोई तितली,
दूर के पौधे पे बैठी दिख रही तो,
दौड़ते-रुकते उसे,
ऊंगलियों में जा दबाता।
भूलकर,
किस काम से निकला था घर से,
बंदरों और भालुओं के खेल में
ताली बजाता।
इस तरह ही,
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
रास्ते तो रास्ते हैं-
वो कभी ऊपर उछलते,
वो कभी नीचे सरकते,
वो अचानक दाएँ-बाएँ दौड़ जाते।
और चौराहों पे आकर,
राहगीरों के भुलावे पर ठठा कर,
खूब हँसते!
बेखबर पर,
चल रहा था वो भी सबके साथ
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
रास्ते पर बेखबर कब तक चलोगे!
एक ठोकर उसको कुछ चेता गई।
फिर भी आदत तो लगी थी
बेसुधी की,
दूसरी ठोकर पे गिर कर चोट खाई।
तीसरी पर सुध जगी-
"ये रास्ते सीधे नहीं है,
देख कर इनको ज़रा चलना पड़ेगा।"
और तब पहली दफ़ा आँखें उठाकर,
रास्ते का ठीक अवलोकन किया-
“हूँ..., ये ही वो रस्ता है जिस पर-
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।”
किंतु अब बढ़ना नहीं वैसा पुराना।
रास्ता वैसा ही था पर
रास्ते को देखने की,
नज़र अब बदली हुई थी।
रास्ता वैसा ही था पर
रास्ते पर चाल कदमों की
ज़रा बदली हुई थी।
रास्ते में रास्ते पर ही नज़र थी,
रास्ते में रास्ते पर ही कदम थे।
और थे जो रास्ते के दोस्त
वे सब खो गए थे-
सींप, मोती और पत्थर,
तितलियाँ, भालू और बंदर।
और निक्कर भी जरा तहज़ीब में थी;
नाक की तबियत भी अब
बेसुध नहीं थी।
रास्ते जो उठ रहे थे, गिर रहे थे,
रास्ते के मोड़ जो पहले
अचानक दिख रहे थे,
अब नहीं उसको अचंभित कर रहे थे।
और चौकन्ना बड़ा बच कर निकलता--
कभी पत्थर, कभी कंकड़
कभी झोंके, कभी अंधड़।
कभी इस बच-बचाने की कवायद
में ज़रा वो डगमगाता,
या कि डर जाता कभी जो देख कर वो
रात का सुनसान साया।
रोककर खुद को ज़रा
ढाढस बंधाता देखता वो,
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
रास्ते की खासियत है,
या कि राहगीरों का है गुणधर्म ये,
कि चलते-चलते रास्ते पर
रास्ते के चित्र भीतर बैठ जाते,
और फिर बिन देख भी उन रास्तों को,
चित्र भीतर के चले रस्ते बताते।
वो भी इक जैसे ही
रस्तों पर कदम चल,
राह में बेहोश-सा फिर चल पड़ा।
और चौराहों, तिराहों पर पहुँचकर,
वो बिना ठिठके ही आगे बढ़ चला।
अब न थी रस्ते की परवा
सीप, मोती और बंदर,
तितलियाँ तो खूब पहले ही
नदारद हो गए थे।
बेसुधी में चल रहे थे सब वहाँ औ’
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
खूब लंबे रास्तों पर चलते-चलते,
देह थक जाती
औं' मन में ऊब आती।
और खाते, और पीते
और कुछ आराम करके
देह को फिट-फाट रख कर के बढ़ाते।
और मन को,
सुर, सुरा और सुंदरी में व्यस्त कर
ऊबें मिटाते।
जोश में बेहोश-से फिर
कारवाँ अपना बढ़ाते।
वो भी अपनी इन थकानों,
ऊब को- यूँ ही मिटाता जा रहा था।
गुनगुनाता और कभी सीटी बजाता,
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
खूब लंबे रास्तों पर,
रास्तों की दूरियाँ, नज़दीक करने,
रास्तों में मील के पत्थर को चुनकर,
दौड़ते और दाँव उस पर सब लगाते।
मील के उस पत्थर की मीठी आस में-
दौड़ते इतना, थकाने भूल जाते।
मील के उस पत्थर की मीठी आस में,
और भय में- उसके आ जाने
किसी के पास में-
दौड़ने और रोकने की कोशिशों में,
रास्ते को छोड़,
लड़ते और झगड़ते,
हारते या जीतते-
पत्थर सजाते।
उसने भी कुछ मील के पत्थर
सफ़र में चुन लिए थे-
और वो भी दौड़ता था, बिन रुके।
मील के पत्थर
कि जिन तक दौड़ पाया,
उनको सीने से लगाए चूमता था;
और जो छूटे ना जिनकी आस बाकी,
गम कलेजे से लगाए घूमता था।
और भी पाने को कितने
मील के पत्थर पड़े थे,
अपने सीने को लगाने
कितने ही सपने गढ़े थे।
रास्ते के मील के इन पत्थरों की
आस लेकर-
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
रास्ते में देह थकती,
रास्ते में ऊब उठती
रास्ते में मील के पत्थर
भगाते जा रहे थे;
और फिर आराम या कुछ मौज पाकर,
मील के पत्थर सजाए जा रहे थे।
और ये ही चक्र बरसों,
और बरसों घूमता था।
वो भी इस के साथ यूँ ही
घूमता-सा चल रहा था।
घूमते-चलते मगर कब,
मील के पत्थर से हटकर
रास्ते पर आँख उसकी रुक गई।
रुक गया वो भी ठिठक कर...।
जैसे नज़रों में कोई विस्मय भरा था।
रास्ता बरसों से ये ही चल रहा-
लगता नया था।
कभी पीछे, कभी आगे
देखता वो राहियों की भीड़ भागे।
फिर कहीं धीरे से बिल्कुल
ख्याल के कानों ने जैसे
फुसफुसाता लफ़्ज कोई
सुन लिया था।
फिर नहीं नज़रे वही थी,
फिर नहीं वो चाल ही थी।
किंतु चलते और रुकते...
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
ख्याल के कानों में बहता
फुसफुसाता लफ़्ज अब कुछ
बात-सी करने लगा था।
बेसुधी जो फुसफुसाने से कहीं
कुछ हट गई थी,
लफ़्ज की गहराइयों में बह गई।
देखता था रास्ते को गौर से वो,
याद करता-
"कब शुरू चलना किया
इस रास्ते पर?
और कैसे दूर इतनी आ गया?"
देखता था रास्ते को गौर से वो,
"रास्ता ये किस तरफ को जा रहा,
और मेरी मंज़िलें किस ओर है?"
लफ़्ज ने कुछ चित्र
ख्यालों को दिए तब--
"याद आए सीप, मोती और बंदर,
होश आया, रास्ते की खा के ठोकर।
होश था, पर होश में कोई नशा था,
रास्ते पर रास्ते का ही गुमां था।
रास्ते की बेसुधी थी,
रास्ते के मौज और आराम भी थे
-बेसुधी में।
रास्ते के मील के पत्थर
और उनकी थी लड़ाई
-बेसुधी में।
रास्ते की भीड़ भी सब चल रही थी
-बेसुधी में।"
किंतु अब इस होश में वो
और भी बेचैन हो, थम-सा गया-
हो रहा क्या रास्तों पर?
क्यूँ चले सब जा रहे हैं?
और फिर कुछ दूर चलकर
रास्ते के बीच में ही
ये बिखरते जा रहे हैं-
और मरते जा रहे है!
जन्मते और मृत्यु पाते
बीच के रस्ते में जो ये-
मौज और आराम करते
सीप, मोती या कि पत्थर मील के
एकत्र करते-- किस प्रयोजन?
किस प्रयोजन चल रहे सब,
किस प्रयोजन चल रहा वो,
किस प्रयोजन सृष्टि ये चलती हुई है?
मृत्यु पर जो छूटता सब,
प्राप्त करके भी कहाँ
कुछ पा सके सब?
और उस पाने की ज़िद में
बेरहम हो रास्ते पर चल रहे हैं!
रास्ते सब शोर से भरते दिखे अब,
कालिमा सब ओर ही छाई हुई थी,
नासिका को भेदती दुर्गंध आई,
ऐ खुदा! खुशबू तेरी किस ओर है!!
रास्ता तो चल रहा था काल में,
किंतु वो तो गुन रहा था ख्याल में-
"कौन हूँ मैं, क्या है सृष्टि,
प्रश्न उद्वेलित किए थे,
“क्या यहाँ मेरा प्रयोजन,
यूँ ही या भटके हुए हैं?
बेरहम इतना ज़माना,
क्या खुदा सच में कहीं है?!"
रात पूनम, आसमां से पूछता,
"तू ही बता!"
रास्ते पर चल रहे सब बेखबर
बस देखकर नीचे ज़मी पर।
आस और आँसू भरी
आँखें उठाए आसमां में--
बेबसी में काल की उस चाल के संग-
चल रहा था वो भी सबके साथ-
इक रस्ता बड़ा था-
वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।
१९०८१९/१९१०१४





