आटा खाने आती मछली,
काँटा पीछे, फँस जाती;
खुशियों की ख्वाहिश में दुनिया,
दुख दरिया में, धँस जाती।
ये जो सुख की 'लाइन' लगी है,
इसकी खिड़की खुली नहीं;
ये 'क्यू' आगे को मुड़ जाती,
दुख-दर्दों की ओर चली।
तुमने 'टिकिट' 'ब्लैक' में लेकर,
कितने पैसे लगा दिए,
और न जाने कितने जन्मों,
इसी 'लाइन' में गँवा दिए।
अब जो तुमको समझ में आए,
सुख की 'क्यू' को छोड़ चलो,
पहले समझो सुख-दुख माया,
पाँव को अपने मोड़ चलो।
जितना तुम बाहर को देखो,
सतत सुखों से हीन रहो;
भीतर अपने देख सको तो,
नित्य सुखी, तल्लीन रहो।
पर कैसे जाना हो भीतर,
ये तो दुष्कर काम लगे!
'एब्सट्रेक्ट'-सी उस दुनिया में,
कैसे दिन और रात लगें?
ये तो आगे का 'मैटर' है,
पहले निश्चय भाव जगे,
"सुख-दुख, दुख-सुख सब माया है"--
भीतर ये विश्वास जगे।
'ट्रस्ट' नहीं इस बात पे हो तो,
अधर में तुम रह जाओगे,
बाहर भीतर के पाटों में,
खुद को पिसता पाओगे।
पहले आटे के पीछे के
काँटे को पहचानों तुम,
रहो 'अवेयर', हर आटे को
देख, नहीं ललचावो तुम।
फिर भी सुख की 'क्यू' में जाकर,
गलती से जो फँस जाओ,
'लाइन' में उसकी बढ़ो जाग कर,
दुःख का रूप समझ पाओ।
बार-बार ऐसे अनुभव से,
'ट्रस्ट' तुम्हारा बढ़ जाए,
हर सुख में दुःख को जो देखो,
निश्चय भाव प्रबल आए।
फिर कुदरत को रहो पुकारो,
कहो दिखाए 'पाथ' तुम्हे,
ज्ञानी जो विश्वास से खोजो,
मिलें कृष्ण ओ पार्थ तुम्हे।
फिर तो केवल धैर्य, 'सरेंडर',
'ट्रस्ट', आस्था बढ़ा रहो,
गुरु की लीला गुरु ही जाने,
अपनी श्रद्धा चढ़ा रहो।
गुरुकृपा से काँटा, आटे के
पहले ही दिख जाता,
दुःख की चादर दूर से दिखती,
भ्रम की 'क्यू' से हट जाता।
गुरु पाने की प्यास जगाओ,
तड़प बढ़े अतिसुंदर है,
ज्ञानी जो स्वीकार तुम्हें लें,
समझो पास समंदर है।
तुमको मेरी 'बेस्ट' 'विशेज़' हैं
ज्ञानी जल्दी मिल जाए,
और 'सरेंडर' कर पाओ तुम,
भीतर प्रज्ञा खिल जाए।
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