इन तंग-तंग-सी गलियों में,
तुम फ़िकर छोड़ दौड़े जाते;
ये देह-परिधि जो बढ़ जाती,
तुम दौड़-दौड़ भूले जाते।
जो दौड़ बहुत आगे बढती,
होतीं ये तंग बहुत गलियाँ;
तुम आगे बढ़ने की धुन में,
इन गलियों में फँसते जाते।
ये गलियाँ बीच-बाज़ारों में,
ये कोठों में चौबारों में;
सोने-चाँदी की चकाचौंध के
दलदल में फँसते जाते।
ये दल-दल तुम्हे निगलने को
आतुर, ये जान कभी पाते;
गलियों के सौदेबाजों को,
अपना रखवाला तुम पाते।
ये रखवाले इन गलियों से,
तुमको मैदानों पर लाते;
तुम पर हो आए ज़ख्मों को,
ये मरहम खूब लगा जाते।
जीवन की लंबी दौड़ों से,
जीवन को राहत मिल जाती;
ये मददगार जैसे तुमको,
संतों-सा रूप दिखा जाते।
इनकी रहमत पर तुम सदके,
क्या न कुर्बानी दे डालो;
कुछ कहने की तो देर कहाँ,
खिदमत इनकी करते जाते।
उन भूली-बिसरी गलियों को,
तुम छोड़ फिरे मैदानों में;
तुम आज़ादी का जश्न मना,
तोहफ़े और दान दिए जाते।
कुछ देर मगर मैंदानों में,
ये सैर-सपाटा चल पाता;
जो मददगार बन आए थे,
असली चेहरे कब छुप पाते!
इनकी भी अपनी गलियाँ हैं,
इन के बाज़ार बड़े रोशन;
इनके कोठों पर बड़ी खनक,
हर रोज़ दीवाने मर जाते।
ये भनक जब तलक लग पाती,
मैदान दूर तक गुम जाते;
नव-गलियों में अपने तन को,
पूरे शबाब में तुम पाते।
फिर दौड़ नयी, फिर चाह नयी,
और महक गली की नयी-नयी;
नव-शक्ति शिराओं में भरकर,
पुरजोर जोश- बढ़ते जाते।
फैली-फैली सी ये गलियाँ,
तुमको तो बड़ा लुभा जातीं,
इनके बाजारों की रौनक को,
देख कदम बढ़ते जाते।
फिर वही पुराना चक्र चले,
फिर देह-गली की जोर-जबर;
गलियाँ जो संकरी फिर पड़ती,
वो रखवाले फिर आ जाते।
जन्मों-जन्मों इन गलियों के,
विषवृत्तो से भ्रमते जाते;
और मदहोशी के पर्दे से,
अपने वृत्तांत लिखे जाते।
दो धन्यवाद अवचेतन का,
जो अनुभव सदा संजो रखते;
जन्मों के अनगिन चक्र जहाँ,
संस्कार-रूप में रह पाते।
ये बार-बार सम-अनुभव से,
अवचेतन छलक-छलक जाता,
अज्ञात चेतना के तलघर,
घर के तल समा नहीं पाते।
जन्मों-जन्मों की सुलगी-सी,
अग्नि जो दबी-रुँधी बैठी;
अवचेतन के तल-घर से उठ,
धूमक के बादल भर जाते।
ये बादल चेतन पर चढ़कर,
अनुभव पर प्रश्न किए जाते;
इन विष-वृत्तों के चक्रों की,
साँसों को रुँधा-रुँधा जाते।
मद्धिम अग्नि के पुंज बड़े
विकराल रूप को धारण कर;
ज्वाला बन, मन को झुलसाते,
प्रश्नों से ताप बढ़ा जाते।
पर क्या केवल कुछ प्रश्नों से,
चेतन के भेद प्रगट होते?!
क्या ज्वाला के इन तापों से,
मन पिघल, समर्पण कर पाते?!
निश्चित ये जिज्ञासा-अग्नी,
चेतन के पार नहीं जाती;
प्रश्नों के तीखे तीर मगर,
परतों को छलनी कर जाते।
चोटिल परतों के भीतर से,
अवचेतन झलक दिखा जाता;
इन झलकों और तस्वीरों से,
तुम होश-होश में आ जाते।
"ये गलियाँ तो सँकरी-सँकरी,
ये देह दौड़ कैसे पाती!"
'कैसे तुम जन्मों-जन्मों से,
दौड़े ये समझ नहीं पाते!
'कैसे तुम जन्मों-जन्मों से,
दौड़े'- ये समझ नहीं पाते;
‘और क्यूँ दौड़े इन गलियों में?’,
उत्तर ये जान नहीं पाते।
भीतर ये प्रश्न कहाँ, किससे,
उत्तर की आस लगा रहते;
मन की दीवारों पर पड़कर,
भ्रम के अनुनाद किया करते।
मैं भ्रम के इन अनुनादों को,
एकाग्र भाव से सुनता हूँ;
भ्रम की परछाई के भीतर,
सुनते हैं सत्य प्रकट होते।
ये सच है, ये आभास नहीं,
भ्रम धीरे-धीरे गलता है;
सच के दर्शन कुछ अंशों में,
तप-ध्यान-साधना दे जाते।
धीरज की किंतु परीक्षा है,
विश्वास सदा अंगारों पर;
झुलसे जो ध्यान हटे थोड़ा,
रखवाले घात लगा रहते।
इसलिये साधना कहते हैं,
साधू भी इसीलिये कहते;
कोठों की बाहर चकाचौंध,
मंदिर भीतर से सध रहते।
ये सतत-निरंतर सधने पर,
ना ध्यान भटकता कोठों से,
साँसों के आगम और निर्गम,
साक्षी का भाव जगा जाते।
पर कभी-कभी ये तंग गलियाँ,
फिर बाज़ारों में आ जाती,
साँसों से ध्यान हटा करके,
गलियों की राह भटक जाते।
जो भूल गए, वो भटक गए,
उनका स्वर साँसों से टूटा,
जो किंतु नहीं भूले, फिर भी-
‘भटके"- इस दु:ख से भर जाते।
पीड़ा ये ध्यान भटकने की,
पीड़ा अज्ञान विकारों की;
पीड़ा "मन के विस्तारों को
क्यूँ पहले जान नहीं पाते?"
इस सधने और भटकने के,
अवकाश बदलते जाते हैं,
निरपेक्ष भाव के जगने से,
दु:ख-पीड़ा द्वार नहीं पाते।
इतना ही अब तक साध सका,
इतना ही सत्य समझ पाया;
दृष्टी जिस ओर टिकी रहती;
सृष्टी का दान वहीं पाते।
कोशिश इतनी ही रहती है,
इन गलियों, इन बाज़ारों में;
बाहर की नज़रें जहाँ रहें,
भीतर साँसों से जुड़ पाते।
इन तंग-तंग सी गलियों में,
हम फ़िकर छोड दौड़े जाते;
ये देह-परिधि जो बढ़ जाती,
हम साँस-साँस सधते जाते।
२३१००२/२३१०१६





