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एक अजन्मे को पत्र
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मैत्री और प्रेम - अनहद की कलम से

ये कैसे तुम हो सकती हो!

नहीं, नहीं उफ्फ़!ये कैसे तुम हो सकती हो!इस अतिमद्धिम जीवदीप में, पुनः नेह से प्राण बसाए,प्राणों का सैलाब बहा,उज्ज्वल-अति उज्ज्वल-तेरा चेहरा भी, दीपक के उजले प्रकाश में।अपने कोमल भावों से …

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तुमको किनारा कर गई

तुमको किनारा कर गई…!ये लहकती, थे मचलती, ‘सरित-सी कल-कलकलाती’,तुम तटस्थत् देखते, तुमको किनारा कर गई!तुम व्योम को ताका करे, के नापते गहराई अपनी,सरित का पर जल तो सूखे!”व्योम कुछ बरसों …

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रविरस

अल सुबह से प्रेम तुमसे हो गया था, शाम को उस ओर जाकर छिप गए तुम; रात को प्रतिबिंब अपना भेजकर, निश्चिंत कितने थे- दिखा अगली सुबह को!राह तेरी कुछ …

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प्रेम

“प्रेम, तुम्हारे द्वार ये कोपलें कैसे खिली हैं?क्या सुवासित पुष्पों के इस भ्रूण-रूप कोद्वार कोई और नहीं दीख पड़ता?!””ये अन्तर की कोपलें है-ए राहगीर,दिव्य इनकी महक औरईश इनका स्वरूप है।कोमलता …

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