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एक अजन्मे को पत्र
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मैत्री और प्रेम - अनहद की कलम से

बेबस, मौन विछोह-2

डरा-डरा सा आशंकित-सा चलता था मैं देख, साथ तुम चलती हो ना!आँखे थोड़ी तिरछी करके रहा बराबर देख, साथ तुम चलती हो ना!कई कदम हम साथ चले देखा मैंने तुम …

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बेबस, मौन विछोह-१

कितना मुश्किल साथ में चलना,साथ छोड़ फिर चलना,कितना मुश्किल रुक जाना है, मोड़ साथ में मुड़ना…!उम्र साथ, ना साथ हौसला,ना विश्वास किसी का,कितना मुश्किल मुड़के देखना,मोड़ अजाने मुड़ना…! बहुत आहिस्ता-आहिस्ता …

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क्यों ना तुम फिर से लिख डालो!

कभी-कभी जिंदगी में हम अपने दुख में इतने डूब जाते हैं कि उसके सिवा और कुछ नज़र ही नहीं आता…! ना कोई दोस्त, ना हमदर्द… ! कोई मित्र जब अपने …

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क्यूँ सच को तू रहा उतारे!

कल जो नज़र आता था सच, बिलाशक; आज दिखता है झूठ का बेदर्द चेहरा…! और कल…? कल तो तय करेगा वक़्त का हर आता लम्हा…! वहम, भरम के परदे ढाँप …

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