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मैत्री और प्रेम - अनहद की कलम से

राग और विराग

ये क्या है, हमसफ़र होनाऔर फिर दूर हो जाना, मिलना और राही से,राह का फिर बदल जाना।लगता यूँ कि जीवन भर,रास्ते एक ही होंगे, मगर मोड़ों पे, रस्तों सेमुड़कर दूर …

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शुष्क, सुन्न-सा रिश्ता!

शुष्क, सुन्न-सा रिश्ता! ना सकुचाहट, ना गर्माहट, ना पिघला, ना बहता। शुष्क, सुन्न-सा रिश्ता! ना रिश्ते के इस स्वरूप पर, तुझे-मुझे कुछ शिकवा, ना इसको कुछ दृढ़ करने की, तेरी-मेरी …

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यारा खूब खिला करते

वही रेत है, वही घड़ी है, वही सरकना चुपके से, बार-बार उल्टा-पुल्टा कर, यार खूब मिला करते।बरसों बाद मिले तुम सबसे, पर जैसे कल का नगमा; जिसे साथ में, सुर …

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तुम हमारे ध्यान से जाती नहीं

पल नहीं, क्षण भर नहीं,कुछ देर किंचित भी नहीं-तुम हमारे ध्यान से जाती नहीं।हम विपश्यना कर रहे, तुम साँस के पथ पर सरकती आ गईं। साँस फिर बाहर औ’ भीतर …

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