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एक अजन्मे को पत्र
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मैत्री और प्रेम - अनहद की कलम से

तुम और मैं!

एक नंगे पाँव रेत पर समंदर की,हम साथ चले हाथों में हाथ लिए!कभी दौड़ कर लहरों से खेलें,कभी साथ-साथ गुनगुना ही लिए-“कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है…!” दो चतुर्थी …

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तुम कहाँ हो?

तुम कहाँ हो?बारिश में भीगी मिट्टी की महकतुम्हारी देहगंध सी क्यों लगती है?क्या तुम कहीं आस-पास ही हो?हवा की इस छुअन में क्यों होता हैतुम्हारे स्पर्श का अहसास?क्यूँ रात के …

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प्रेम-रसधार

कल चंदा को देखा तुमने?सूट पहन कर, इक तारे को रिझा रहा था!बादल के टुकड़े को देखा?दूर बैठ कर इक मयूर को नचा रहा था!चमको-चमको प्रेम में चंदा बन कर …

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उम्र लगती है समझने को

शब्दों के प्रपंच और तर्को की निरर्थकता-उम्र लगती है समझने को!प्यार अनुभव है व्याकरण नहीं- जिसके बँधे नियम हो।विस्तृत आकाश में बिखरे तारों की चमक-तुम उन्हे गौर कर सकोगीप्यारे पूनम …

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