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एक अजन्मे को पत्र
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मुख पृष्ठ - अनहद की कलम से

कौन है आतुर!

हर लम्हा बस गुजरता है.. और यह देह हो जाती है उतनी ही पुरानी- लम्हा-लम्हा!इसके भीतर ही छिपा हूँ मैं….! मगर क्या निकल पाऊँगा इस देह से, इसके खत्म हो …

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बूँद-सागर

ऐसा लगता है कि जैसे,बूँद, सागर की तरफ बढ़ जा रही है। मन की परतें हैं सघन और ठोस बिल्कुल,उनसे ही रिस-रिस के अपनी राह चलती-कभी थमती, कभी बढ़ती, कभी …

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निर्ध्वनि की ध्वनि

ये सत्य नहीं साकार हो रहा, प्रभु तब तक मैं डोल रहा; ये समझूँ पर वो भी मानूू, ना पकड़ूँ, ना छोड़ रहा।चलता हूँ इक राह पकड़, फिर किस पगडंडी …

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