कौन है आतुर!
हर लम्हा बस गुजरता है.. और यह देह हो जाती है उतनी ही पुरानी- लम्हा-लम्हा!इसके भीतर ही छिपा हूँ मैं….! मगर क्या निकल पाऊँगा इस देह से, इसके खत्म हो …
हर लम्हा बस गुजरता है.. और यह देह हो जाती है उतनी ही पुरानी- लम्हा-लम्हा!इसके भीतर ही छिपा हूँ मैं….! मगर क्या निकल पाऊँगा इस देह से, इसके खत्म हो …
ये सत्य नहीं साकार हो रहा, प्रभु तब तक मैं डोल रहा; ये समझूँ पर वो भी मानूू, ना पकड़ूँ, ना छोड़ रहा।चलता हूँ इक राह पकड़, फिर किस पगडंडी …