न तुम, न मैं
न ‘तुम’ हो, न ‘मैं’ हूँ,हैं तो सिर्फ इस ‘तुम’ और ‘मैं’ के अदृश्य भाव। और इन्ही भावों के गुणनफल से हो जाता है अनंत फैलाव। इस फैलाव में कई …
न ‘तुम’ हो, न ‘मैं’ हूँ,हैं तो सिर्फ इस ‘तुम’ और ‘मैं’ के अदृश्य भाव। और इन्ही भावों के गुणनफल से हो जाता है अनंत फैलाव। इस फैलाव में कई …
सब कुछ जैसे जम-सा गया है। जमावट तो भीड़ की है, किंतु वो भगदड़ किसी एक जगह जैसे रुकी-सी है।कोई कोलाहल या शोरगुल नहीं है, सब जैसे एक कसी जमावट …
ज़िंदगी दो विपरीतताओं के बीच खड़ी दिखती है-अस्त-व्यस्त-से शोर-गुल के बीचएक गहरा, स्तब्ध-सा सन्नाटा-जहाँ अचानक चलते-चलते मैं थम जाता हूँ।उस उथले शोर-गुल से गुज़रते, थम जाता हूँ सुननेउस निरंतर गहराते …