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एक अजन्मे को पत्र
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मुख पृष्ठ - अनहद की कलम से

न तुम, न मैं

न ‘तुम’ हो, न ‘मैं’ हूँ,हैं तो सिर्फ इस ‘तुम’ और ‘मैं’ के अदृश्य भाव। और इन्ही भावों के गुणनफल से हो जाता है अनंत फैलाव। इस फैलाव में कई …

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जमी-सी भीड़

सब कुछ जैसे जम-सा गया है। जमावट तो भीड़ की है, किंतु वो भगदड़ किसी एक जगह जैसे रुकी-सी है।कोई कोलाहल या शोरगुल नहीं है, सब जैसे एक कसी जमावट …

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दो विपरीतताओं के बीच

ज़िंदगी दो विपरीतताओं के बीच खड़ी दिखती है-अस्त-व्यस्त-से शोर-गुल के बीचएक गहरा, स्तब्ध-सा सन्नाटा-जहाँ अचानक चलते-चलते मैं थम जाता हूँ।उस उथले शोर-गुल से गुज़रते, थम जाता हूँ सुननेउस निरंतर गहराते …

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वृक्ष के दैवीय संदेश- दो शैलियाँ

वृक्ष समेटे हैं बहुत से दैवीय संदेश। बस करते हैं प्रतीक्षा, किसी खोजी, किसी सुनने वाले की। मिलते ही बता देते हैं, धरती पर गिरने के नियम;साथ बहते ही खोल …

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