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मुख पृष्ठ - अनहद की कलम से

अदृश्य सत ही तक रहा…

इस तरफ़, इस तरफ़औ’ इस तरफ़ मैं बढ़ रहा…मैं बढ़ते-बढ़ते रुक रहा,मैं रुकते-रुकते चल रहा,कि आँख की किनार से, अदृश्य को मैं तक रहा।कोई पुकारता मुझे, सुदूर से,”सराय है,”कुछ पहर, …

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हिय तुमने जब मेरा छीना

हिय तुमने जब मेरा छीना।पहले-पहल तब,आँख खोलकर, ज़रा ठहर कर,दाएँ-बाएँ सिर को घुमाकर… आँख नचाकर,समझ रहा मैं…बदल गया रे मेंरा जीना,हिय तुमने जब मेरा छीना।फिरिक चमक मेंरी अँखियों ने देखी।देखी, …

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हर तरफ बस तुम ही हो!

‘हर तरफ बस तुम ही हो’-मैं इस भाव को घनीभूत करता हूँ।मैं मानता हूँ अपने आप कोघिरा हुआ, तुमसे ही- सब ओर,और अपने भीतर भीइस तुम्हारे ही होने के भाव …

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ये क्या है, प्रभु?

संध्या समय थमी हवा में होता है एक सन्नाटा…होती है उस सन्नाटे की भी एक आवाज़…!किंतु अभी तोवो आवाज़ भी सुनाई नहीं देती…!ना शोर है,ना हैं मौन केशांत स्वर ही,ना …

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