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द्वंद्व से निर्द्वंद्व की ओर
ये जोर-जबर, ये छीन-झपट,ये ठाँय-ठाँय, ये डाँट-डपट,ये मार-धाड़, ये खींच-तान,हल्ला-गुल्ला, षडयंत्र-कपट।नवभोर हुई, धरती का नव-शृंगार हुआ,चहके पंछी, नव-जीवन का संचार हुआ,मृग-छौनों ने नन्ही-नन्ही आँखें खोलीं,उजला-उजला देखो नव-संसार हुआ!ये खून-खराबा, लूट-मार,धक्कम-धक्का, …
दर्द
दर्द गहराई देता है।पर उस दर्द की सतह पर ना रुक जाओ।उतरो उस दर्द की गहराई में;गहरे… और गहरे, तब पाओगे,सिर्फ गहराई है,दर्द तो नदारद है! १८१००८/१८१००८





