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मुख पृष्ठ - अनहद की कलम से

हे प्रभु! शक्ति दो

तुम्हारी प्रीत में अब और मगन होता रहूँ,तुम्हारे गीत में उस प्रेम को गुनता रहूँ !तुम बहते हो देह के हर कण, हर रोम में प्रभु! कुछ यूँ करो कितुम्हारी …

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कितना धीरज!

कितना धीरज…!बूँद-बूँद घट भर जाता है,पर क्या धीरज रख पाता है?!बीते बरस खेत बुआया, बारिश की सहजी आस,खेत दरारें, खेत हो गए, ना आई बरसात।रूठी खेती, रूठा भाग;रोया मन, असुअन …

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चक्रव्यूह

अभिमन्यु की तरहचक्रव्यूह में फँस गया ऐसा लगता है। किंतु कुछ अंतर है-अभिमन्यु का चक्रव्यूह तो एकविशेष चक्रव्यूह था,और थी उसकी विधि बाहर आने की भी।किंतु मुझे तो जीवन पूर्णतः …

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कील पर सँवार दो

इस तरफ या उस तरफया बीच में चलता चलूूँ,या बैठ जाऊँ बस यहीं– तूफ़ान ले के उड़ चले या धूप में झुलस पड़े!सब दिशा अदृष्य है,ना कोई कोण दिख रहा,बात …

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