तुम आ जाओ, प्रभु
ठहरी, पर अशांत,क्रांत-क्रांत… !समय का पल-पल आँख से गुज़रता…मन को धकियाता-साकुरेदता और उग्र करता…पर बेबस मैं…कौन मैं?!मन नहीं।आत्मा नहीं।देह नहीं।फिर कौन?!कौन आभास पाता है, मन की उग्रता का?कौन ग्राह्य करता …
ठहरी, पर अशांत,क्रांत-क्रांत… !समय का पल-पल आँख से गुज़रता…मन को धकियाता-साकुरेदता और उग्र करता…पर बेबस मैं…कौन मैं?!मन नहीं।आत्मा नहीं।देह नहीं।फिर कौन?!कौन आभास पाता है, मन की उग्रता का?कौन ग्राह्य करता …
जीवन के दो मूलाधार, वायु और जल से संसार।वायु मनुज साँसों में लेता, इन साँसों से जीवन बनता,दो साँसों के मध्य श्रेयस में, धन्यवाद वृक्षों का गुनता।वृक्षों का परिवार वनों …
उस पूनम को मैंने तुम्हे चाँद में देखा।मैंने देखा कि तुम एक रातरानी सेफुसफुसाते कुछ कहती हो…।मैं अपने आँगन में पूछता हूँ,इक गुलाब की पंखुड़ी से,”जागती हो, अभी सोई नहीं?”वो …
एक वेदना है, जो व्यक्त होना चाहती है,पर रह जाती है, अव्यक्त।कई कारण हो सकते हैं उसकेअव्यक्त रह जाने के-व्यक्त कर पाने की कला का अभाव,व्यक्त करने से संभावित संकट …