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मुख पृष्ठ - अनहद की कलम से

क्यों ना तुम फिर से लिख डालो!

कभी-कभी जिंदगी में हम अपने दुख में इतने डूब जाते हैं कि उसके सिवा और कुछ नज़र ही नहीं आता…! ना कोई दोस्त, ना हमदर्द… ! कोई मित्र जब अपने …

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तृष्णा तो शान्त हुई!

तृप्ति…!क्या छिपी है अकूट धन संपदा और उसके आडंबर में या मिल जाती है किसी कोमल हृदय के स्पर्श मात्र से…! था किवाड़ खुल रहा,खुल रहा चूँ-चूँ कर,हल्के से धक्के …

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क्यूँ सच को तू रहा उतारे!

कल जो नज़र आता था सच, बिलाशक; आज दिखता है झूठ का बेदर्द चेहरा…! और कल…? कल तो तय करेगा वक़्त का हर आता लम्हा…! वहम, भरम के परदे ढाँप …

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