जीना, होना और हारा केंद्र
कुछ घुमड़ता-सा, उमड़ता-सा…व्यक्त होने को बेचैन-सा।दिल के आस-पास या दिल में हीकुछ खुलने की चाह में व्याकुल–व्यग्र-सा। हारा-केंद्र पर ध्यानऔर उस तक पहुंचने की आकुलता?नहीं… अभी आकुलता तो नहींमगर तड़प …
कुछ घुमड़ता-सा, उमड़ता-सा…व्यक्त होने को बेचैन-सा।दिल के आस-पास या दिल में हीकुछ खुलने की चाह में व्याकुल–व्यग्र-सा। हारा-केंद्र पर ध्यानऔर उस तक पहुंचने की आकुलता?नहीं… अभी आकुलता तो नहींमगर तड़प …
ये ना जाने क्यूँ मुझे,लग रहा यूँ देख के,आपका ये चित्र मेरे सामने।लाड़ से यूँ देखते,प्यार से यूँ देखते,मुस्कुरा के भर रहे हो भाव से। जैसे कह रहे हो यूँ,मैं …
“कौन हूँ मैं, क्या है सृष्टि?”प्रश्न उद्वेलित किए थे।”क्या यहाँ मेरा प्रयोजन,यूँ ही या भटके हुए हैं?बेरहम इतना ज़माना,क्या खुदा सच में कहीं है?!””देख भीतर” चाँद बोला,”सत्य के गुलशन खिले …
होश उसने जब संभाला-चल रहा था वो भी सबके साथ-इक रस्ता बड़ा था-वो भी बढ़ता जा रहा था, रास्ते पर।खिलखिलाता, खेलता, रोता कभी लड़ता-झगड़ता, और कुछ पढ़ता-पढ़ाता, रोज़ सोता, रोज़ …