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मुख पृष्ठ - अनहद की कलम से

रोम रोम में

जीवन के बड़े गूढ़ फ़लसफ़े हैं। कुछ बस लफ़्ज़ों में जिंदा रहते हैं, पर हमे महसूस होता है कि हम उन जीवित-से लफ़्ज़ों को बहुत करीब से जी रहे हैं…। …

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…हो ही जाना है

दास्तान-ए-दिल खुद-ब-खुद बयाँ हो जाती है, कलम की स्याही से..! कागज़ का कुछ हुनर है कि वो दिल के किसी बारीक सूराख से खींच लाता है मासूम सी इक ग़ज़ल…! …

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विरह-वेदना

हम टूटते हैं अकेले, और अकेले ही समेटते हैं टूट कर बिखरे हुए बेशुमार टुकड़े। बटोरते है उस धैर्य, उस आस्था और उस विश्वास के इधर-उधर छितराए महीन कण…! लम्हा-लम्हा …

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… और तभी से ये ‘तट’ होगा 

ज़िंदगी के तमाम थपेड़ों से जूझते कब विदा हो जाता है प्रेम इस जीवन से, ख्याल ही नहीं रहता…। जब तलक समझ आता है, शून्यता गहन हो जाती है। फिर …

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