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लघु कविताएँ - अनहद की कलम से

कुछ कतरने बिखरीं-सी

..१..शीश पर शिव के सुशोभित,शशि ही बस शुभ्र है–मैं निरा बलहीन,शिवनख की भी स्तुति क्या करूँ!! २४०२०९ ..२..पंख हैं?महसूस तो होते नहीं…!उन उड़ानों को कि जिन काज़िक्र तुम करती रहीं …

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कुछ कतरने प्रेम की

..१..वो अमवा का पेड़ औ’ उस परइक कोयल का कूकना,वो गर्मी की शाम औ’ उसमेंपवन का बेसुध घूमना–ले जाता मेरे चिंतन को,उड़ा के जीवन के उस पल में,जिसे मैं फिर …

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मेरे आरंभिक लेखन के पन्ने- भाग २ (१९८९)

१२ अप्रेल १९८९”स्वयं अति-थी अपने नाम की तरह।”तूफाँ था वो आया हुआ,याद करता हूँ आज मैं,प्रेम किया था मैंने,जीवन में किसी से।देखा था मैंने तुमको,इक रोज़ जहाँ पर,आता हूँ देख …

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मेरे आरंभिक लेखन के पन्ने- भाग १ (१९८६)

ज़िंदगी अब उबाऊ हो चली है,इस वीरान दिल में किसी के लिए जगहन बच सकी है अभी;कहाँ हम मोहब्बतकिया करते थे कभी,अब यूँ है कि नफ़रत भी नहीं करते!——————–जी नहीं …

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