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एक अजन्मे को पत्र
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लघु कविताएँ - अनहद की कलम से

तुम और मैं!

एक नंगे पाँव रेत पर समंदर की,हम साथ चले हाथों में हाथ लिए!कभी दौड़ कर लहरों से खेलें,कभी साथ-साथ गुनगुना ही लिए-“कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है…!” दो चतुर्थी …

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तुम कहाँ हो?

तुम कहाँ हो?बारिश में भीगी मिट्टी की महकतुम्हारी देहगंध सी क्यों लगती है?क्या तुम कहीं आस-पास ही हो?हवा की इस छुअन में क्यों होता हैतुम्हारे स्पर्श का अहसास?क्यूँ रात के …

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देह-प्रेम

तुम भवन के साथ भँवरे हो जाते हो।ईंट, गारा, रेत, मिट्टी से बना;चमकदार और चटकदार रंगों से लिपटा!तुम अक्स देख कितने मोहित हो!तनिक इधर से, तनिक उधर से-तराशने में कितने …

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…सिर्फ होने के लिए!

देह में चुभते-चुभते,तुम्हारी आँखो को भी चुभने लगे हैं।काँटों का भी उद्देष्य होता है कोई…या निपट निर-उद्देष्य भी हो सकते हैं……सिर्फ होने के लिए… !! ०९०३२४/०९०३२४