तुम और मैं!
एक नंगे पाँव रेत पर समंदर की,हम साथ चले हाथों में हाथ लिए!कभी दौड़ कर लहरों से खेलें,कभी साथ-साथ गुनगुना ही लिए-“कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है…!” दो चतुर्थी …
एक नंगे पाँव रेत पर समंदर की,हम साथ चले हाथों में हाथ लिए!कभी दौड़ कर लहरों से खेलें,कभी साथ-साथ गुनगुना ही लिए-“कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है…!” दो चतुर्थी …
तुम कहाँ हो?बारिश में भीगी मिट्टी की महकतुम्हारी देहगंध सी क्यों लगती है?क्या तुम कहीं आस-पास ही हो?हवा की इस छुअन में क्यों होता हैतुम्हारे स्पर्श का अहसास?क्यूँ रात के …
देह में चुभते-चुभते,तुम्हारी आँखो को भी चुभने लगे हैं।काँटों का भी उद्देष्य होता है कोई…या निपट निर-उद्देष्य भी हो सकते हैं……सिर्फ होने के लिए… !! ०९०३२४/०९०३२४