इस पथ पर मैं कैसे आया…
मैं स्वयं आ गया इस पथ पर या तुम ही मुझको ले आए?क्या भूले-भटके मैं आया, लक्ष्य साध या मार्ग चला?निकल पड़ा यूँ ही आवारा, या जीवन से भाग चला?!क्या …
मैं स्वयं आ गया इस पथ पर या तुम ही मुझको ले आए?क्या भूले-भटके मैं आया, लक्ष्य साध या मार्ग चला?निकल पड़ा यूँ ही आवारा, या जीवन से भाग चला?!क्या …
साँस जाती है और साँस आती है।यूँ तो ये फासला होता है एक पल का। मगर कभी ये हो जाता है एक अंतहीन फ़ासला ! १९११२१/१९११२१
न ‘तुम’ हो, न ‘मैं’ हूँ,हैं तो सिर्फ इस ‘तुम’ और ‘मैं’ के अदृश्य भाव। और इन्ही भावों के गुणनफल से हो जाता है अनंत फैलाव। इस फैलाव में कई …
ज़िंदगी दो विपरीतताओं के बीच खड़ी दिखती है-अस्त-व्यस्त-से शोर-गुल के बीचएक गहरा, स्तब्ध-सा सन्नाटा-जहाँ अचानक चलते-चलते मैं थम जाता हूँ।उस उथले शोर-गुल से गुज़रते, थम जाता हूँ सुननेउस निरंतर गहराते …