लघु कविताएँ
प्रभु! तुम बूँद-बूँद रिसते-से हो
प्रभु! तुम बूँद-बूँद रिसते-से हो बसमेरे भीतर।तुम बाहर तो हो इतने विराट,इतने विस्तृत-और मैं खुला हूँ और खाली भी।यही मान मैं पुकारता हूँ तुम्हे,इस आस में कि तुम आओगे,एक तेज …
दर्द
दर्द गहराई देता है।पर उस दर्द की सतह पर ना रुक जाओ।उतरो उस दर्द की गहराई में;गहरे… और गहरे, तब पाओगे,सिर्फ गहराई है,दर्द तो नदारद है! १८१००८/१८१००८





