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लघु कविताएँ - अनहद की कलम से

दो विलाप के स्वर

एक- पुकार तुम कहाँ हो प्रभु! क्या मेरी पुकार इतनी मंद हैकि उसकी ध्वनि तुम्हारे कानों तक पहुँचती नहीं?क्या तुम इतने दूर हो प्रभु,कि तुम्हारी विराट दृष्टि भी मुझ पर …

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ये बंधन ही स्वतंत्र लगे

सुमिरन को फैला दो, जीवन के हर क्षण में।रोम-रोम में अपना ही विस्तार करो प्रभु!बस तेरा ही नाम जपूँ,बस तेरा ही ध्यान करूँ;बस तेरे ही भावों में तैरूँ मैं प्रतिपल,प्रभु! …

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प्यासा ही रह जाता

ये अकेलापन नहीं।एकांत में मैं बैठकर, तुमसे गुफ़्तगू करूँ!बह रहे तुम याँ से वाँ तक,और मैं बस, ‘मैं’ कहाँ?तुममें घुलता, ‘तुम’ कहाँ?पर कहीं फिर भी है दूरी…!”धीर धरो।”———————————ये मदिरा मैं …

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दो प्रार्थनाएँ प्रभु से

एक- पिघला लो मुझे अपने आप में! प्रभु! इस सत्य मे मुझे स्थित करो। पिघला लो मुझे अपने आप में। क्यों, क्या हम दोनों का तत्व ऐसा नहीं है जो …

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