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लघु कविताएँ - अनहद की कलम से

कितना धीरज!

कितना धीरज…!बूँद-बूँद घट भर जाता है,पर क्या धीरज रख पाता है?!बीते बरस खेत बुआया, बारिश की सहजी आस,खेत दरारें, खेत हो गए, ना आई बरसात।रूठी खेती, रूठा भाग;रोया मन, असुअन …

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अद्वितीय

बाहर निकलते ही मछली पर पड़तीहवा की बारिश की मार और,पानी में डूबते तुम!गलफड़ों और फेफड़ों का अंतरजिस दिन समझ जाओगे,दूर कर लोगे बहुत सी उम्मीदें और,बच जाओगे उनके पूरा …

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विरह के आँसू

मैंने बनाई है अपने आँसुओं से इक माला-उन आँसूओं से जो निकले थे तुम्हारे विरह में।तुम आओ तो पहना दूँ उसे तुम्हारे गले में। तुम उसे उतारना मत,छूने देना उसके …

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तीन प्रेम-विरह गीत

एक- ये चाँद अपने गाँव भी यही चाँद ले जाना -मैं याद रहूँगा!कभी अमावस में भी आसमाँ मे टाँक देना..!मैंने तारों को मना लिया हैऔर झील को समझा दिया है.!! …

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