ये उत्सव, ये पर्व, ये त्यौहार…!ये प्रकृति हंसती है, झूमती है, नाचती है, अपने ही ढंग से…!ये प्रेम, ये ममता और ये अपनापन…!ये प्रकृति जताती है, निभाती है, फुसफुसाती हैअपने …
होम कर अपना अस्तित्व तुम दे जाते हो रात के गहन अंधकार में उजियारे की रोशनी …! मौन… निस्वार्थ…! दीपक तुम कितने प्रभावशाली हो,हो नन्हे पर कितने बलशाली हो;मैं अचरज …
भीतर कुछ है जो तुमसे कुछ कहना चाहता है… दिखाना चाहता है तुम्हे तुम्हारा रास्ता…! उसे सुनो, वो तुम्हें जानता है… तुम्हारे अंतरतम को भी वो खूब पहचानता है। उठो, …
सुख और दुख, सही और गलत, रोशनी और अंधेरा… जीवन दो विपरीतताओं के संगम से ही पूर्ण होता है। वस्तुतः ये विपरीतताएँ – विपरीतताएँ नहीं बल्कि एक दूसरे की पूरक …