तभी ये अपना व्योम रचेगा
उस पोखर पर गिरते कंकड़ से उसके अस्तित्व का एक अंश–भर उठता है तमाम तरंगों की हुलक से…। पर मैं तो उस हुलक से बस कुछ देर तरंगित होता हूँ …
उस पोखर पर गिरते कंकड़ से उसके अस्तित्व का एक अंश–भर उठता है तमाम तरंगों की हुलक से…। पर मैं तो उस हुलक से बस कुछ देर तरंगित होता हूँ …