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एक अजन्मे को पत्र
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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

भ्रम से साक्षी तक

इन तंग-तंग-सी गलियों में, तुम फ़िकर छोड़ दौड़े जाते;ये देह-परिधि जो बढ़ जाती,तुम दौड़-दौड़ भूले जाते।जो दौड़ बहुत आगे बढती,होतीं ये तंग बहुत गलियाँ;तुम आगे बढ़ने की धुन में,इन गलियों …

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तुम हमारे ध्यान से जाती नहीं

पल नहीं, क्षण भर नहीं,कुछ देर किंचित भी नहीं-तुम हमारे ध्यान से जाती नहीं।हम विपश्यना कर रहे, तुम साँस के पथ पर सरकती आ गईं। साँस फिर बाहर औ’ भीतर …

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अब थोड़ा अमृत-जल भर दो!

सारी गागर रीत चुकी है, अब थोड़ा अमृत-जल भर दो।तुमने मुझको खाली करने ध्यान सिखाया, ध्यान विधी भी सारी अब तो भूल चुकी हैं; आत्मद्वार की चाबी पाने दौड़ रहा …

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कहाँ हूँ मैं!

“कुछ लिखो तुम।””क्या लिखूँ ?लिखने के जैसे भाव भीतर खो गए।जग रहा मैं, पर जगत की चाल-गति में,भाव भीतर सो गए!शून्य में खुद को तलाशूँ-शून्य में ढूढ़ूँ तुझे पर, शून्य …

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