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एक अजन्मे को पत्र
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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

मैं परमलोभी हूँ रे!

सुधिजन उन सभी को बड़ा लोभी कहते हैं, जो सुस्वादु भोजन पाने को आतुर हों-और पाकर आनंदित होते हैं।अपनी जिंह्वा को तृप्त कर स्वयं भी तृप्त अनुभव करते हैं।कुछ मधु …

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रास्ता, मैं और अनंत यात्रा

मैँ चलता-दौड़ता,लड़खड़ाता-गिरता,फिर उठता, चलता-दौड़ता-लड़खड़ाता-गिरता-उठता,उस रास्ते के अंतिम छोर तक पहुंचता हूँ,और पाता हूँ, कि वो रास्ता-कहीं आगे, और कहीं नहीं जाता। मैं असमंजस से भरता-ढूँढता,रोता-बिलखता,शांत होता-फिर ढूँढता-और कुछ ना पाता-सोचता …

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हे प्रभु, मदद करो!

बाहर बारिश, भीतर सूखा,तृप्त भूख, पर प्यासा भूखा!पतझड़ की शाखा-सा उजड़ा,पत्तों को देखूँ बेबस-सा,गिरते और समाते उर में- धरती, लाज बचा लो!—————————————–कहाँ हो- मैं ढूँढ़ता हूँ तुम्हें,कि तुम बताते थे …

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भाव घने हैं- मौन से शब्द तक

भाव घने हैं-पर उनका शब्दों में खिलना, खिल कर छंदों में गुँथ जाना, और छंदों का स्याही से कागज़ पर आना-कुछ मुश्किल-सा क्यूँ लगता है?भाव घने हैं-पर शब्दों की नाव …

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