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एक अजन्मे को पत्र
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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

कौन है आतुर!

हर लम्हा बस गुजरता है.. और यह देह हो जाती है उतनी ही पुरानी- लम्हा-लम्हा!इसके भीतर ही छिपा हूँ मैं….! मगर क्या निकल पाऊँगा इस देह से, इसके खत्म हो …

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स्वीकार कर आगे बढ़ो

वो रिश्ते- जिनने जी लिया जो वक़्त अपना;उन्हें पहचानों, औ’ उनकी उम्र को स्वीकार कर आगे बढ़ो।ये जीवन है बड़ा लंबा, कई किरदार सब खेलें; कि समझो ये नया रस्ता, …

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बूँद-सागर

ऐसा लगता है कि जैसे,बूँद, सागर की तरफ बढ़ जा रही है। मन की परतें हैं सघन और ठोस बिल्कुल,उनसे ही रिस-रिस के अपनी राह चलती-कभी थमती, कभी बढ़ती, कभी …

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