कौन है आतुर!
हर लम्हा बस गुजरता है.. और यह देह हो जाती है उतनी ही पुरानी- लम्हा-लम्हा!इसके भीतर ही छिपा हूँ मैं….! मगर क्या निकल पाऊँगा इस देह से, इसके खत्म हो …
हर लम्हा बस गुजरता है.. और यह देह हो जाती है उतनी ही पुरानी- लम्हा-लम्हा!इसके भीतर ही छिपा हूँ मैं….! मगर क्या निकल पाऊँगा इस देह से, इसके खत्म हो …
वो रिश्ते- जिनने जी लिया जो वक़्त अपना;उन्हें पहचानों, औ’ उनकी उम्र को स्वीकार कर आगे बढ़ो।ये जीवन है बड़ा लंबा, कई किरदार सब खेलें; कि समझो ये नया रस्ता, …