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एक अजन्मे को पत्र
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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

निर्ध्वनि की ध्वनि

ये सत्य नहीं साकार हो रहा, प्रभु तब तक मैं डोल रहा; ये समझूँ पर वो भी मानूू, ना पकड़ूँ, ना छोड़ रहा।चलता हूँ इक राह पकड़, फिर किस पगडंडी …

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न तुम, न मैं

न ‘तुम’ हो, न ‘मैं’ हूँ,हैं तो सिर्फ इस ‘तुम’ और ‘मैं’ के अदृश्य भाव। और इन्ही भावों के गुणनफल से हो जाता है अनंत फैलाव। इस फैलाव में कई …

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जमी-सी भीड़

सब कुछ जैसे जम-सा गया है। जमावट तो भीड़ की है, किंतु वो भगदड़ किसी एक जगह जैसे रुकी-सी है।कोई कोलाहल या शोरगुल नहीं है, सब जैसे एक कसी जमावट …

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