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एक अजन्मे को पत्र
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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

कितना धीरज!

कितना धीरज…!बूँद-बूँद घट भर जाता है,पर क्या धीरज रख पाता है?!बीते बरस खेत बुआया, बारिश की सहजी आस,खेत दरारें, खेत हो गए, ना आई बरसात।रूठी खेती, रूठा भाग;रोया मन, असुअन …

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चक्रव्यूह

अभिमन्यु की तरहचक्रव्यूह में फँस गया ऐसा लगता है। किंतु कुछ अंतर है-अभिमन्यु का चक्रव्यूह तो एकविशेष चक्रव्यूह था,और थी उसकी विधि बाहर आने की भी।किंतु मुझे तो जीवन पूर्णतः …

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उम्मीद, नाउम्मीद और धन्यवाद

एक- उम्मीद कुछ समझ नहीं आ रहा!सच में बहुत उम्मीद रहती है हर रोज़…हर रोज़ पर यूँ ही गुज़र जाता है…तेरे इन्तज़ार में बस यूँ चुप हूँ…और इस चुप में …

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कील पर सँवार दो

इस तरफ या उस तरफया बीच में चलता चलूूँ,या बैठ जाऊँ बस यहीं– तूफ़ान ले के उड़ चले या धूप में झुलस पड़े!सब दिशा अदृष्य है,ना कोई कोण दिख रहा,बात …

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